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मैं नागफनी हूँ

तपते हुए रेगिस्तान के बीच में, ठूठ सी खड़ी , मैं नागफनी हूं | नागफनी होना कैसा लगता है कभी सोचा है ? जिसके पास कोई नहीं आना चाहता है, अभाव में पली अमृत से वंचित नागफनी, कांटों से ढकी धूप में झुलसती नागफनी, जीवन के लिए लड़ती प्रतिपल संघर्ष करती, मैं जिजीविषा का उत्कृष्ट प्रतीक हूं | मैं नागफनी हूं | संघर्ष करके ही मैंने जीवन पाया है| रेगिस्तान की धूप में पानी की एक भी बूंद के बिना,  सीना तानें खड़ी हूं | प्रतिपल लड़ती और जीतती हूं मैं| मैं नागफनी हूं | बंजर में जीवन का प्रतीक संघर्ष की पराकाष्ठा हूं | मैं खूबसूरत नहीं मैं कोमल नहीं मैं कांटों से भरी हूं | मेरा जीवन ही प्रतिकार है | कठिनाइयों और बाधाओं का, मैंने हारना सीखा नहीं | उस प्रचंड सूर्य की भीषण ज्वाला से, उन बिना जल के मेघों से | ककरीली पथरीली भूमि में भी, मैं रस खोज लेती हूं | मैं नागफनी हूं | मैं  विजयगान हूं कर्मठता का| मैं उत्तर हूं उपेक्षा और अभाव का | मैं शुन्य में कुछ होने का एहसास हूं| मैं नागफनी हूं|

यह जीवन है

हो सकता है अपने कदमों के निशान छोड़ ना पाए हम, लेकिन इस डर से चलना तो छोड़ नहीं सकते | यह माना कि अनहोनी पर जोर नहीं अपना, पर ऐसा भी क्या ? किसी के आंसू पोछ नहीं सकते | माना हर सपना पूरा नहीं होता इस जहां में, इस डर से अपना सपना तो छोड़ नहीं सकते | मौत तो आनी है हर किसी को एक दिन , मौत के डर से जीना तो छोड़ नहीं सकते  | जाने के बाद इस जहां से याद रहे ना हमारी, इस डर से हर रिश्ता तो तोड़ नहीं सकते  ? खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाएंगे , पर ! कर्तव्य पथ पर चलना तो छोड़ नहीं सकते | यह जीवन है संघर्ष के पथ पर चलना ही पड़ेगा , बाधाओं के डर से निर्णय से मुख मोड़ नहीं सकते |

अतीत का मोह कितना सही?

हम में से बहुत लोग प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रति आग्रही हैं और कुछ लोग भारत के गौरवशाली अतीत से भावनात्मक रूप से प्रभावित हैं| वे प्राचीन समाज और संस्कृति की पुरानी व्यवस्था को फिर से स्थापित करना चाहते हैं उनके विचार से ऐसा करने से बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा| इसमें कोई शक नहीं कि अतीत काल में लोगों ने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की लेकिन वर्तमान समय के आधुनिक विज्ञान और तकनीकी की बराबरी यह किसी भी स्थिति में नहीं कर सकती है| वृहद परिप्रेक्ष्य में हम इस बात की अनदेखी बिल्कुल भी नहीं कर सकते हैं की प्राचीन भारतीय समाज में सामाजिक अन्याय भी प्रमुखता से विद्यमान था| वर्ण व्यवस्था में निचले पायदान पर खड़े लोगो विशेषकर शुद्राें और अतिशूद्रों( अस्पृश्य) को जिस प्रकार नीरीह बना दिया गया था | जिस प्रकार उनके साथ पशुओं की तरह व्यवहार किया जाता था उसकी हम आज के संदर्भ में परिकल्पना भी नहीं कर सकते हैं| इसके अतिरिक्त न्याय व्यवस्था और महिलाओं के साथ भेदभाव की प्रथा भी पुरुष प्रधान समाज के पक्ष में कार्य करती थी| इसका अर्थ यह है कि अतीत की तरफ जाने का मतलब है ...

विभिन्नता में एकता भारतीय सभ्यता का पोषक मत

लिखने की कुशलता प्राप्त करने के बाद मनुष्य को सभ्य माना जाने लगा| आज भारत में लेखन की जितनी भी शैलियां प्रचलित है सभी प्राचीन लिपियों से विकसित हुई है| संपूर्ण विश्व में प्रचलित सभी भाषाओं के लिए यह बात समान रूप से सत्य हैं|  आज की सभ्यता कई शताब्दियों के विकास का परिणाम है| हम सभी अक्सर भारत में विभितता में एकता की बात करते हैं, लेकिन इस विचार का पोषण कहां से हुआ यह तथ्य काफी रोचक है| आर्यों के के बाद ग्रीक, इंडो आर्य सीथियन, हूण,तुर्क आदि ने किसी न किसी कारणवश भारत को अपना घर बनाया| इन सभी ने भारत की सामाजिक, साहित्यिक, कला एवं शिल्प आदि के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया| उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक के सांस्कृतिक तत्वों का सम्मिलन भारतीय संस्कृति की एक खास विशेषता है| प्राचीन समय से ही भारत कई धर्मों की भूमि रहा है| भारत में ब्राह्मण या हिंदू धर्म, जैन और बौद्ध धर्म का जन्म हुआ, किंतु इन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होंने टकराव का रास्ता न चुनकर आपस में सामंजस्य और संवाद स्थापित किया| हमारा देश विविधताओं के बावजूद अपनी अंतर्निहित गहरी एकता को दर्शाता ...

क्या फर्क है दोनों में?

 खुली आंखों के सपने, बंद आंखों के सपने , क्या फर्क है दोनों में? सीपी में बंद मोती, मुट्ठी में बंद मोती, क्या फर्क है दोनों में? डाली पर बैठी मैना, पिंजरे में बंद मैना, क्या फर्क है दोनों में? सुख में बहते आंसू, दुख से बहते आंसू, क्या फर्क है दोनों में? मंदिर में जलता दिया,   दीपक से लगी आग, क्या फर्क है दोनों में? श्रद्धा से सिर का झुकना, शर्मिंदगी से सिर  का झुकना , क्या फर्क है दोनों में? फर्क है एहसास का, भावना और विश्वास का, पाने और खोने का , सृजन  और  संघार का.

पेट्रोल वाली पॉलिटिक्स

पेट्रोल और डीजल ने ऐसी आग लगाई, कोई भी युक्ति काम ना आई. जनता करे दुहाई- दुहाई, सरकार को कुछ भी दे न सुनाई. बीच बजरिया तेल निकल गया लोगों का, खूब मिला है बदला अपने वोटों का. रोज चढ़े है पारा इसका  ऊपर को, राम भरोसे छोड़ दिया है डीजल को. ईधन के बढ़ते हुए दाम रुलाते हैं, पेट्रोल,डीजल, गैस नींद में भी डराते हैं. सुरसा के मुख के जैसे रोज बढ़े हैं यह तो, खून पसीने की कमाई इसमें गई समाई, फिर भी कोई डकार ना आई. पाँच साल में एक बार जनता की बारी आई है, इस चक्कर में कितनाे ने अपनी सरकार गवाई है.

क्रोध विनाश का कारण है

विद्वानों ने कहा है कि यदि पीना है तो क्रोध को पीओ, क्रोध यह ऐसी अग्नि है जिसमें मनुष्य के सुख और शांति जलकर नष्ट हो जाते हैं. कहा गया है कि क्रोध में व्यक्ति का चुप रहना ही हितकर है. क्रोधी मनुष्य का अपनी वाणी पर अधिकार नहीं रहता है, जिसके फलस्वरुप वह अनर्गल और दिल को दुखाने वाली बातें करता है जो संबंधों में जहर का काम करती है. क्रोध के वशीभूत हुआ व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन पूरी तरह से खो देता है, उचित और अनुचित का विचार किए बिना उसके मुख से जो शब्द निकलते हैं. उनका कितना गहरा असर पड़ता है इसका उसे तनिक भी भान नहीं होता. क्रोध के कारण बनी बनाई बात भी हाथ से निकल जाती है. चुप रह कर और अपनी भावनाओं को नियंत्रित करके क्रोध पर विजय प्राप्त की जा सकती है. जिस प्रकार समुद्र द्वारा अपनी मर्यादा लाघे जाने पर तबाही मचती है. उसी प्रकार क्रोध के वशीभूत व्यक्ति  भी अपनी मर्यादा लाघ जाता है. जिसका परिणाम लड़ाई झगड़ा और रिश्तो में बिखराव होता है. आपसी सम्मान के बिना कोई भी रिश्ता टिक नहीं सकता लेकिन क्रोध में सबसे ज्यादा नुकसान सम्मान को ही पहुंचता है. कहते हैं कि बातों का घाव कभी नहीं भरत...