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नैतिक मूल्य जीवन का आधार स्तंभ

महात्मा गांधी के अनुसार सात महापाप है- मेहनत के बिना धन ,अंतर आत्मा के बिना आनंद ,चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिक मूल्यों के बिना व्यापार ,इंसानियत के बिना विज्ञान ,त्याग के बिना धन ,सिद्धांतों के बिना राजनीति. हमें याद रखना चाहिए कि नैतिक मूल्य ,अच्छी आदतें और सदगुण पैदाइशी नहीं होते वे सीखे जाते हैं. जीवन को आकार देने के लिए हमें अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करनी पड़ती हैं. एक पुरानी कहावत है"अगर पैसा चला गया तो समझो कुछ नहीं गया, अगर स्वास्थ्य चला गया तो समझो कुछ गया ,लेकिन यदि चरित्र चला गया तो समझो सब कुछ चला गया" व्यक्ति का चरित्र अमूल्य है इसके बिना मनुष्य का जीवन बेकार है. पैसा हर काम की कीमत नहीं होता. युवा पीढ़ी जो मूल्यों को सीखें बगैर दौलत विरासत में पा लेती है बिना सही शिक्षा और दिशा निर्देशन के वह हर चीज को पैसे से तोलते हैं. वह मानते हैं कि हर चीज बिकाऊ है और हर चीज की कीमत है वास्तव में यह सच नहीं है. वह लोग जिनका जीवन मूल्यों पर आधारित है वह बिकाऊ नहीं होते और ना ही वह अपनी कोई कीमत लगाते हैं. लोग रातों-रात सफल होना चाहते हैं चाहे फिर उन्हें अपनी आत्मा को ह...

जीवन

कितना सच और कितना झूठ, जीवन तू है अजब अबूझ. पकड़ते-पकड़ते छूट गई डोरी,  क्या खोया क्या पाया, यही समझने में बीत गए, कितने दिन साल और महीने. यह आपाधापी, यह अपने और पराए का भेद, वह अपने जो परायों से भी बढ़कर है, उनसे तुमने ही मिलवाया. ढ़ेर सारी इच्छाएं और आकांक्षाएं, कुंठा और आहत भावनाएं, प्यार और दुलार भी है, सपनों का संसार भी है.  रोज  नई  कड़ियां है जुड़ती . बहते हुए नद सा जीवन,  कभी चंचल और निर्मल, कभी शांत और शीतल, कभी प्रचंड वेग से उठती लहरों की धार. नहीं इसका कोई पारावार.

व्यक्ति के विकास में माहौल की भूमिका

हमारा शरीर वैसा ही बनता है जिस प्रकार का भोजन हम ग्रहण करते हैं, ठीक उसी प्रकार हमारा मस्तिष्क भी वैसा ही सोचता है जिस प्रकार के माहौल में हमारी परवरिश होती है. हमारे आसपास का माहौल हमारे मस्तिष्क के लिए भोजन का कार्य करता है. जिससे हमारी आदतें व्यवहार और व्यक्तित्व निर्धारित होता है. प्रकृति द्वारा हर मनुष्य को कोई ना कोई खास क्षमता विरासत में मिली होती है, परंतु हम उस  क्षमता को कितना और किस प्रकार विकसित कर पाते हैं यह हमारे माहौल पर निर्भर करता है. मस्तिष्क पर माहौल का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है जिस तरह भोजन का शरीर पर. मान लीजिए हम भारत की जगह किसी दूसरे देश में पैदा होते तब हम कैसे इंसान होते? क्या आपने कभी सोचा है कि अगर हम भारत की जगह अमेरिका में पैदा हुए होते क्या तब भी हमारे कपड़े पहनने का तरीका यही होता? क्या तब भी हम ऐसा ही भोजन करते ? और क्या तब हम किसी दूसरे धर्म के अनुयाई नहीं होते? कहने का मतलब इतना है कि हमारा विकास किस तरह होगा यह पूरी तरह से हमारे माहौल पर निर्भर करता है. जिस प्रकार सांचा गीली मिट्टी को आकार देता है उसी प्रकार आसपास का माहौल एक मनुष्य को आक...

जीवन पथ

जीवन की ये राहें, ले जाएंगी कहां? क्या होगा वहां?  नदी ,झील ,दुर्गम पहाड़ी या कोई शीतल झरना? नहीं जानता है कोई. बस चलना है ,हर हाल में चलना है. चाहे पैर हो लहूलुहान, या हो पथ फूलों का सुखमय महान. किस राह पर क्या मिलेगा? इससे हैं हम अनजान.  हर हाल में चलते जाना वही तो है इंसान.

अटल बिहारी वाजपेई- भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने  राज्यसभा में एक भाषण के दौरान अटल जी को भारतीय राजनीति का"भीष्म पितामह" कहा था .अपने करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों में "बाप जी" के नाम से प्रसिद्ध अटल जी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश राज्य में स्थित ग्वालियर के शिंदे की छावनी में हुआ था. अटल जी ने अपना जीवन देश की भलाई के लिए एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रुप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया था. अटल जी अपने प्रारंभिक जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आ गए थे. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया और 23 दिन तक कारावास में रहे. अटल जी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट ख्याति प्राप्त की. राष्ट्रधर्म और पाञ्चजन्य पत्रिकाओं के संपादक के रूप में कार्य किया इसके अतिरिक्त स्वदेश और वीर अर्जुन समाचार पत्रों के संपादक के रूप में अपना योगदान दिया. पत्रकारिता से अटल जी ने राजनीति में प्रवेश किया 6 अप्रैल 1980 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के रुप में एक नई यात्रा की शुरुआत की. अपने राष्ट्र और भाषा पर  गौरव करने वाले अटल बि...

वीरों की गौरव गाथा

जो मातृभूमि की पूजा में अपना शीश चढ़ा आए, यह आजादी का महापर्व है आओ उनकी गाथा गाये, सीमा पर प्राचीर बने जो डटे हुए हैं सीना तान, रोज लहू से चरण पखारे करते हैं हम उन्हें प्रणाम, मार्तंड हो मातृभूमि के फैले जिससे प्रखर उजास, मां की गरिमा कायम रखते कोई नहीं है तुमसे खास, युद्ध में बाढ़ में सुरक्षा में प्रहार में, मातृभूमि के हर कार्य में, तुम ही हो   अग्रिम कतार में, बर्फ की चादर हो, लहराता सागर हो, बरसती हुई आग में,  वज्र के मन से कूदते हर रण में, स्वतंत्रता की रक्षा करते स्वाभिमान के पोषक हो, आतंक  से लोहा लेते मातृभूमि के रक्षक हो, सिंह का साहस हो, शत्रु के लिए पावक हो, रण में महाकाल हो, प्रचंड तुम प्रहार हो, गर्व हो हमारा, आन, बान, शान हो, हे वीर तुम महान हो सभी का स्वाभिमान हो,.

समरथ को नहिं दोष गुसाईं

  जीवन धारा के विपरीत दिशा में तैरने का प्रतीक है. जब गोस्वामी जी कहते हैं कि- समरथ को नहिं दोष गुसाईं तो इसका सीधा सा मतलब यह है कि प्रकृति सर्वश्रेष्ठ और संघर्षशील को ही प्राथमिकता देती है. सच तो यह है कि संसार में जीवन का अस्तित्व शुरू होने से पहले मां के गर्भ में ही यह संघर्ष शुरू हो जाता है. जो कमजोर है उसे प्रकृति स्वयं नष्ट कर देती है. इसके लिए हमें चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को समझना आवश्यक है जिसके अनुसार- सभी जीव जीवित रहने के लिए संघर्ष करते हैं भोजन, आवास और उचित वातावरण  के लिए जीव धारियों में निरंतर संघर्ष होता रहता है. इस संघर्ष में वही जीव जीवित रह पाते हैं जो इस संघर्ष में सफल होते हैं. कमजोर जीव नष्ट हो जाते हैं. इसके अनुसार प्रकृति सर्वश्रेष्ठ का ही चुनाव करती है. संस्कृत की सूक्ति-" वीर भोग्या  वसुंधरा "के द्वारा हम इस बात को समझ सकते हैं. जिसका तात्पर्य यह है कि निडर और संघर्षशील व्यक्ति को ही इस धरती के सुखों को भोगने का अधिकार प्राप्त होता है. महान योद्धा और विश्व विजई सिकंदर महान को कौन नहीं जानता, सिकंदर में यदि लड़ाकू प्रवृत्ति ...